विद्रोह

वो एक रात जो अनगिनत स्वच्छंद विद्रोहों की साक्षी थी,
एक पिता के विद्रोह को बेटी की कलाइयों ने कैद कर रखा था। – राजेन्द्र

फ़साने

ज़िन्दगी के फ़साने यूँ ही हस्ते हस्ते न पूछा कर ज़ालिम
इतने जख्म लगे पड़े है, सँभलने में थोड़ा वक्त लगेगा ।

नई सुबह ?

नई सुबह अच्छी है
किरने भी सच्ची है
पर भोर पे अभी भी यकीन नहीं होता
क्युकी नभ में कुछ छुपा सा है
हो सकता है कि वो अंधेरा छांटने वाला सूरज हो
या फिर निशा का प्रहरी मेघराज
या फिर हो सकता है सात रंगो से सजा इन्द्रधनुष
अपितु आनेवाली है बरखा आज
मुमकिन है सतरंगी किरणों से आएगा एक नया समन्वय
मुमकिन है नवभारत का वह स्वप्न अलौकिक और अक्षय
मुमकिन है एक राग में गाए सारे भूचर और जलचर
मुमकिन है इन वादियों में घुल मिल जाए सारे वेश वर्ण
परन्तु तर्क वितर्क से अलग राजनीति की संज्ञा है
राजनीती दिन को चांद के नाम पे जला सकती है
और रात को सूरज के नाम पर
सागर को रेगिस्तान के नाम से ललचा सकती है
और धरती को पानी के नाम पर
लगता तो नहीं कि यूं ही सवेरा होने पाएगा
या तो उस सवेरे का इतिहास बदल दिया जाएगा
या उसपर दाग लगाकर धूमिल कर दिया जाएगा

रात की तन्हाईयाँ…

ये रात की तन्हाईयाँ भी कुछ कमाल करती है ..
कुछ जाना सा, कुछ अंजाना सा, एक सवाल करती है
न जाने क्यों जितना दूर जाऊ उतना करीब आ जाती है
शायद उनसे ज्यादा, कही ज्यादा, मुझसे प्यार करती है

पूछा तन्हाई ने क्या दिया उस बेवफा ने आप को
वफ़ा के बदले वफ़ा कभी क्या मिली कभी थी आप को
कैसे कहूं ए जान-ए-मन, तेरी हस्ती मेरे मरने में जीने में है
पर उसका वजूद तो हर एक पल, हर लम्हा मेरे सीने में है

कुछ नया कहिये जनाब, अब वो रसीली यादें रही नहीं
हमसे इश्क़ लड़ा लीजिये, यादें हमारी जरा अनजान ही सही
हम कहे, दिलरुबा, तेरे नशीले होंठो के जाम, लबों पे हमारे चढ़ेगी नहीं
क्युकी, उसके शराबी होंठो का नशा, मेरे लबों पे आज भी काबिज़ होता है
नयी शराबों का नशा भले ही मदहोश कर ले कुछ पल के लिए हमे
पर वो पुराना शौक है, जिसके नशे से ये दिल दूर हरगिज़ न होता है|

mother’s day!

जब पाश्चात्य सभ्यता को देखकर हम किसी एक दिन विशेष भर के लिए माँ को याद कर सकते है, तब दूर बैठे एक कवी का संकल्प !!

मैं भी mother’s day मना लेता गर तुझे एक पन्ने में लिख पाता
गर तेरे आंसुओ के समंदर को एक शीशी में भर पाता
गर तेरी ममता के काव्य को एक गीत में गा पाता
गर तेरी मूरत को एक देवालय तक ही सीमित रख पाता
सूरज से प्रखर तेरे तेज को गर इन् खिड़कियों में बांध पाता
चाँद सी शीतल करुणा को गर मुट्ठी में भर पाता
मैं भी mother’s day मना लेता गर तुझे एक पन्ने में लिख पाता
गर लाखों माये वृद्धा श्रम में न छूटी होती
गर उनके हाथों में भी स्वाभिमान की रोटी होती
गर उसके दूध का कर्जा एक तृण भी चुकाया होता
गर उसकी ढलती उम्र को एक बोझ न पाया होता
गर उसके जीवन के प्रतिबिम्ब को एक दिन में माप मैं पाता
मैं भी mother’s day मना लेता गर तुझे एक पन्ने में लिख पाता

Rajendra Mishra

वियोग …

इश्क़ की बाँहों में
चलते चलते यूँ ही राहों में
कंधे पे रख के सर को मेरे
अश्कों की भीगी सी चादरे
वो हम को ओढाते रहे
अश्कों की भीगी सी चादरे

सबर बेसबर सा था मैं
हाथों में हाथ ले चलते रहे
उनके सवालों पे चुप्पी रखे
आँखों से बेबसी गा रहे

पूछती वो हमसे रही
नज़दीकियों की क्या मज़बूरी थी
जाने के दिन जो पास आ रहे
क्यों नजदीकियां मुझे तड़पा रही

कैसे कहुँ उस्से सुन मेरी जान
ये तड़प बुझते दिए की सी है
है पता की लौ दूर जा रही
फिर भी रो रो के उसे फुसला रही

पूछा उसने ये इश्क़ है या आंसुओं की लड़ी
साथ चलने के वादे किये थे कभी
तुम दूर जा रहे , मैं यही हूँ खड़ी
क्या बेबसी मैं कुछ न कर पा रही

अब उसे झूठे वादों में फासना सही न लगा
मन में रोये पर आँखों तक ला न सका
छोड़ आये वो बाहें, वो गलियां वही
वो प्यारी सूरत, अखियां बस तकती रही
साक्ष्य थी आसमान में चांदनी की लड़ी
और वो निशा जो रह गयी खड़ी की खड़ी